नगर महोत्सव एवं शहीद मेले में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भोर तक जमे रहे श्रोता

वो वतन बेंचकर मुस्कुराते रहे, हम वतन के लिये सर कटाते रहे

– नगर महोत्सव एवं शहीद मेले में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन
भोर तक जमे रहे श्रोता

सनशाइन समय बस्ती से मनीष मिश्रा की रिपोर्ट

बस्ती । नगर महोत्सव एवं शहीद मेले में मंगलवार की रात अखिल भारतीय कवि सम्मेलन को समर्पित रही। वरिष्ठ कवि डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ की सरस्वती वंदना ‘‘ वीणा वादिनी मां जापे दृष्टि परि गयो, कोटि मूरख कैं कालिदास सा बनावत हैं’’ से शुरू कवि सम्मेलन भोर तक चला।
कवि सम्मेलन के आरम्भ में भारतीय जनता पार्टी नेता राना दिनेश प्रताप सिंह, नगर पंचायत अध्यक्ष श्रीमती राना नीलम सिंह ने कवियों, शायरों को अंग वस्त्र भेंट कर उनका अभिनन्दन किया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि डॉ. ज्ञानेन्द्र द्विवेदी दीपक और संचालन डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ ने विनोदपूर्ण शैली में किया।
ओज के वरिष्ठ कवि भूषण त्यागी मंच पर छा गये- उनकी पंक्तियां ‘‘वो वतन बेंचकर मुस्कुराते रहे, हम वतन के लिये सर कटाते रहे’ पर देर तक तालियों से पाण्डाल गूंज उठा। डा. सत्यमवदा शर्मा ने कुंछ यूं कहा-एक दरिया को समुन्दर भी बना सकती हूं।प्यार, मनुहार का मंजर भी बना सकती हूं’ ने मंच को नई दिशा दी। श्रीमती रूचि द्विवेदी की रचना ‘‘ मेरे हक में हो फैसला भी तो कैसे, मुकदमा भी तेरा, अदालत भी तेरी’ ने युगीन सत्य को स्वर दिया। डा. हेमा पाण्डेय ने ऋंगार पर कुछ यूं कहा ‘ प्यार का रस फिजा में उतर जायेगा, चांदी में नहां कर निखर जायेगा। हास्य कवि ताराचंद तनहा की रचनाओं पर खूब ठहाके लगे ‘ मैं मन में था जिनके लिये श्रद्धा लिये हुये, एक दिन मिले वो हाथ में अद्धा लिये हुये’’ । ओज के सशक्त हस्ताक्षर डा. ओ.पी. वर्मा ओम ने ‘भारती पुकारती, कहती है बार-बार, एक-एक पुत्र बोल वंदे मातरम, राग, द्वेष, भेद भाव, धर्म जाति छोड़कर, प्रेम रस राष्ट्र का घोले वंदे मातरम’ सुनाकर राष्ट्रबोध को जागृत कराया। महेश प्रताप श्रीवास्तव की पंक्तियां ‘ जंग फिर हम हार बैठे हैं, तो लड़ना बंद कर दें..? आसमा से आ गिरे भू-पर तो उड़ना बंद कर दें’’ के द्वारा प्रश्न खड़े किये। बिहार से पधारे हास्य कवि नन्द जी नन्दा ने श्रोताओं को खूब हंसाया। विनोद उपाध्याय हर्षित की रचना ‘ बस्ती मण्डल की गाथा को विशेष सराहना मिली। संचालन कर रहे डा. रामकृष्ण लाल जगमग ने श्रोताओं को जहां अपने हास्य व्यंग्य की रचनाओं से हंसाया, वहीं गंभीर रचनाओं से सोचने समझने को विवश किया। अध्यक्षता कर रहे डा. ज्ञानेन्द्र द्विवेदी ‘दीपक’ ने आयोजन की सराहना करते हुये कुंछ यू कहा- ऐ अब्र हमें तू बार-बार सैलाब की धमकी देता है, हम तो दरिया की छाती पर तरबूज की खेती करते हैं’ के द्वारा हौसलों को उडान दिया। इसी क्रम में अर्चना श्रीवास्तव, काजी अनवार पारसा, अजय श्रीवास्तव ‘अश्क’, डा. अफजल हुसेन अफजल, दीपक सिंह ‘प्रेमी, जगदम्बा प्रसाद भावुक, रहमान अली ‘रहमान’, अजीत श्रीवास्तव ‘राज’, चन्द्रमती चतुर्वेदी आदि की रचनायें सराही गई।
कवि सम्मेलन में मुख्य रूप से संजय सोनकर, विजय जायसवाल, दिनेश चौरसिया, मन्नू सिंह, देवेन्द्र उपाध्याय, सन्नी राय शाही, आशीष सिंह, राहुल, अनिल श्रीवास्तव, मनीष श्रीवास्तव, राकेश पाण्डेय, देवेशधर द्विवेदी, शिवम गुप्ता, लकी सिंह, विजय दूबे, प्रशान्त श्रीवास्तव, विजय श्रीवास्तव के साथ ही हजारों की संख्या में श्रोता देर रात तक जमे रहे।

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